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वेब सीरीज़ के नाम पर क्या परोसा जा रहा है?

Reported By : विजय शर्मा

Published On : October 31, 2020

हमारा जीवन बाजार संचालित हो गया है। बाजार और व्यापारी अपने लाभ-लोभ और लालच में हमारी रूचियों को विकृत कर रहे हैं।

टीवी या अन्य प्लेटफ़ॉर्म, जैसे वेब सिरीज या ओवर द टॉप पर आने वाले सीरियल्स में मेरी बहुत रूचि नहीं है। न ही देखने का समय है। लेकिन इस बीच नेटफ़्लिक्स के ‘आर्या’ सिरीज के विज्ञापन मोबाइल तथा टीवी और कम्प्यूटर (फ़ेसबुक आदि) पर बार-बार चमकने लगे। उसमें सुष्मिता सेन मुख्य भूमिका में है। मुझे सुष्मिता का गंभीर व्यक्तित्व अच्छा लगता है। इसलिए सोचा चलो देखा जाए। मगर देख कर बड़ी निराशा हुई। पूरी सिरीज में सुष्मिता के अलावा देखने को कुछ न था। वैसे उन्होंने भी निराश किया क्योंकि न मालूम उनके जैसी अभिनेत्री ने गाली देना कैसे स्वीकार कर लिया। मुझे उनके मुँह में जबरदस्ती ठूँसी हुई गाली नहीं सुहाई। मेरी दृष्टि में अचानक उनका स्तर थोड़ा नीचे गिर गया। पूरे सीरियल की बात करूँ तो उसमें देखने लायक कुछ था ही नहीं। बेजरूरत मार-पीट, चोरी, हत्या, तस्करी डाली गई है। खूबसूरत लोग, उच्च वर्ग, महँगे कालीन-सोफ़ा, कार, स्विमिंग पूल कुछ लोगों को लुभाते होंगे पर मुझे न जँचे। क्योंकि दिखावटी जीवन खोखला होता है। जानबूझ कर बेडरूम सीन और सेक्स की भरमार से कोई बात नहीं बनती है। हिंसा-यौनिकता दिखा कर आप किस बात को बढ़ावा दे रहे हैं?

फ़िर विक्रम सेठ के उपन्यास पर आधारित और मीरा नायर द्वारा निर्देशित ‘ए सूटेबल बॉय’ का विज्ञापन आने लगा। सोचा साहित्य पर आधारित है कुछ तो अच्छा होगा। लेकिन नहीं कुछ भी अच्छा न लगा। न अभिनय, न संवाद अदायगी। संवाद और संवाद अदायगी इसका सबसे लचर पक्ष है। यहाँ भी बिना बात गालियाँ हैं। और अगले पल याद आने लायक कोई दृश्य नहीं है। फ़िल्म या शो वह अच्छा होता है जो समाप्त होने के बाद भी आपको हॉन्ट करे। आपको दोबारा देखने के लिए आमंत्रित करे।

लेकिन सोशल मीडिया में इनकी खूब चर्चा होती है। टीवी के कार्यक्रम पर सेंसर बोर्ड की निगाह होती है, वहाँ से इनका पारित होना एक अनिवार्य शर्त है। पर वेब सिरीज की धूम है, वेब शृंखला तथा ओवर द टॉप में दिखाई जाने वाली सामग्री के साथ ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती है। मैं सेंसर बोर्ड के पक्ष में बहुत नहीं हूँ। मुझे लगता है कलाकारों और कला से संबंधित लोगों को स्वानुशासित होना चाहिए। मगर इन प्रोग्राम के विषय में सरकार से अपील करूँगी। सरकार से मेरी अपील है, ऐसे फ़ूहड़ कार्यक्रमों पर अवश्य रोक लगनी चाहिए। दर्शकों को इनका बॉयकॉट करना चाहिए।

‘जो लोग पसंद करते हैं हम वही दिखाते हैं’, कहते हुए बनाने वाले पल्ला झाड़ लेते हैं। यह सही महीं है। किसी भी कला का एक उद्देश्य लोगों में सत्प्रवृति जगाना, उनकी रूचि को परिमार्जित करना होता है। ये शो कुत्सित प्रवृति को बढ़ावा देने वाले हैं। इनका तर्क है लोग आम जीवन में गालियाँ देते हैं। कितना लचर तर्क है। क्या आम जीवन में घटने वाली सब बातों को दिखाया जाना चाहिए, क्या दिखाया जा सकता है? बहुत पहले नाट्यशास्त्र प्रणेता भरत मुनि ने मंच पर कुछ बातों के प्रदर्शन को निषिद्ध बताया था और यह इस कला पर भी लागू होता है, होना चाहिए। और जो दिखाया जा रहा है वह समाज का यथार्थ नहीं है। मिर्जापुर के कुछ निवासियों ने ‘मिर्जापुर’ पर टिप्पणी करते हुए स्पष्ट कहा है कि उनका शहर कदापि ऐसा नहीं है जैसा उसे यहाँ दिखाया जा रहा है। वह मात्र गालियों और अपराध का शहर नहीं है। इसी तरह मैंने सुना-पढ़ा है कि यहाँ सिरीयल्स में धर्म विशेष का मखौल उड़ाया जाता है। मेरी दृष्टि में यह उचित नहीं है।

इनमें से कुछ साइट ग्राहकों को उल्लू भी बनाते हैं। मुझे ऋतुपर्ण घोष पर काम करने के लिए उनकी एक फ़िल्म देखनी थी जो कहीं नहीं मिल रही थी अंत में पता चला यह होईचोई साइट पर उपलब्ध है। एक ही फ़िल्म देखनी थी मगर उनका प्लान पूरे एक साल का था। हार कर साल भर की राशि जमा कर दी। ईमेल भी आ गया और मैंने तत्काल फ़िल्म देख ली। मगर अगले दिन मेरा फ़ोन नंबर और ईमेल आईडी उनकी साइट से गायब था। कई बार ईमेल किया कोई उत्तर नहीं मिला।

ऊपर मैंने बाजार और व्यापारियों के हवस की बात लिखी है। नेटफ़्लिक्स, एमाज़ोन प्राइम, हंगामाडॉटकॉम जैसी साइट की कमाई का अंदाजा आम व्यक्ति नहीं लगा पाता है। वह सोचता है 199 या 99 या 499 (ये 99वे का फ़ेर बड़ा भ्रामक है) रुपए महीना या 499 रुपए साल कौन-सी बड़ी रकम है पर इनकी ग्राहक संख्या इनकी अरबों की कमाई का खुलासा करती है। एक जानकारी के अनुसार पिछले तीन महीनों में नेटफ्लिक्स के डेढ करोड़ एप डाउनलोड हुए हैं। दूर बैठे ये बेपनाह रकम से खेलते हैं और हमें अमर्यादित चीजें परोसते हैं। जरूरत है दर्शकों/ग्राहकों को जागरुक करने की, इनके काले धंधों का खुलासा करने की।


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