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ह्युमैनिटी के लिए नाक की ऊंचाई पर गर्व करने वाले टाटा की नाक बहुत नीची है

Reported By : Editorial

Published On : May 21, 2020

ह्युमैनिटी के नाम पर टाटा अपने जिन अस्पतालों पर खुद की नाक ऊंची महसूस करता है दरअसल वह बहुत नीची है। शहरवासियों ने महसूस किया कि नहीं मालूम नहीं। लेकिन खबरखण्ड का दावा है कि आप इस खबर को पढ़ने के‌ बाद टाटा की कथनी और करनी में ज़रूर फर्क़ भांप लेंगे।

टाटा मेन अस्पताल के नज़दीक मेहरबाई टाटा मेमोतियक कैंसर अस्पताल है जिसे 1975 में तत्कालीन चेयरमैन JRD TATA ने स्थापित किया था। उस वक्त टाटा का दावा ज़रूर यह रहा होगा कि वह जमशेदपुर की परिधि में आने वाले तमाम क्षेत्रों में कैंसर के‌ मरीज़ों का इलाज करेंगे। यह क्षेत्र कौन से होंगे? ज़ाहिर है ग्रामीण क्षेत्र, जहां बेसहारा लाचार दलित आदिवासी रहते हैं।

इस अस्पताल को अपग्रेड भी किया गया जिसका उदघाटन टाटा के सर्वे सरवा रतन टाटा ने 2018 मार्च में किया। अब यहीं‌ से खेल शुरु होता है नाक ऊंची जताने का। अस्पताल अपग्रेड हुआ तो कई लायक डॉक्टर को सबसे पहले अस्पताल से निकाल‌ दिया गया। अस्पताल के खूबसूरत होने से पहले जिस चार्ज पर इलाज होता था वह अचानक अस्पताल के अपग्रेड करने के साथ बेतहाशा बढ़ गया। 

चलिए हम चार्ज पर नहीं आते वह अस्पताल का अपना मसला है। लेकिन चार्ज यह कह कर बढ़ा कि फैसिलिटी‌ बढ़ाई‌ जायेंगी अस्पताल में। तो भाई कैसी फैसिलिटी? अरे वही मेदांता टाइप की। तो मेदांता में तो मरीज़ अंदर वार्ड में रहते हैं लेकिन उनके जो अटेंडर होते हैं उनके बैठने के लिए लॉंज की व्यवस्था होती है। ताकि दूर दराज़ से आए लोगों का ख्याल रखा जाए जो परेशान न हों, रात हो तो वेटिंग हॉल में रात बिताएं न की सड़क पर।

अब बताइए परिवार के किसी सदस्य का नाम कैंसर जैसे मर्ज़ से जुड़ भर जाए, तो स्वीकार कर लीजिए परिवार मन और धन दोनो से टूट जाता है। रही बात तन की तो ऊंची फीस पर इलाज करने वाले टाटा की व्यवस्था में चलने वाले अस्पताल यह ज़िम्मेदारी बखूबी निभाते हैं। इलाज के लिए जो दबे कुचले लोग अस्पताल आते हैं उनके लिए हमेशा ही‌ मसला‌ रहा है। थोड़ी बहुत मदद नज़दीक ही धतकिडीह में स्थित लॉज से हो जाती‌ है। 

रही बात इस लॉकडाउन में दूरदराज़ से आए मरीज़ दिन‌भर अस्पताल में जहां डॉक्टर के फरमान सुनते हैं वहीं नर्स और कलर्क बाबुओं की धुत्कार। जब दिन भर थक कर चूर हो जाते है तो रात में ऊंची फीस लेने वाले टाटा किसी वेटिंग रूम की स्थापना तो किए नहीं, फिर क्या अस्पताल के बाहर सड़क का‌ किनारा बिस्तर बनता है और खुला आसमान चादर।

लेकिन नींद उन्हें नहीं आती क्योंकि हर कुछ मिनट में मरीज़ों से लेकर अटेंडर की बगल से गुज़रती रसूखदारों की गाड़ियां फर्राटे भरती पार हो‌जाती‌ हैं। उन्हें गाड़ियों की हर आहट पर लगता रहता है कहीं देह से न गुज़र जाएं यह गाड़ियां। कैंसर से पहले ही रोड दुर्घटना से कहीं मौत न हो जाए। अब कहेंगे कि वह मरीज़ जो सड़क‌ के किनारे ज़मीन पर सो रहे है लॉज क्यों नहीं गए। तो साहब लॉकडाउन में शहरवजे सरताज यानी DC ने लॉज में कमरे देने लिए फरमान जारी किया है। अब किसी‌ की मजाल‌ कहां कि DC साहब से जाकर पूछे कि लॉज नहीं तो दूसरा विकल्प क्या है? 

जी लॉकडाउन में यही आलम है झारखण्ड के सबसे बड़े लेकिन प्राइवेट अस्पताल का जो टाटा के रहमोकरम पर ही नहीं मोटी फीस पर भी चलता है। अब आप कहेंगे कि मोटी फीस तो आपको तुरंत अस्पताल की साइट दिखाई जाएगी कि हम फ्री इलाज करते हैं। तो इस लेख को पढ़ने वाले स्वयं से सवाल पूछें कि उन्होंने कब और किसके कैंसर का इलाज मेहरबाई में फ्री होते देखा है।

यह सब तब है जब टाटा समूह ने कोरोना से लड़ने के लिए 1500 करोड़ रुपये का देने का एलान किया। अरे रतन टाटा जी इन 1500 करोड़ से आप सिर्फ 1 करोड़ ही मेहर बाई में मरीज़ों के रहने के लिए इंतेज़ाम‌में लगा देते तो भी पैसे बच जाते। और 1499 करोड़ कोरोना से जारी जंग में लगा देने से टाटा की नाक नीची थोड़े ही होती। वैसे जो 1500 करोड़ देने का एलान कर टाटा अपनी पीठ थपथपा रही है। वह पैसा आया कहां से? किसी टाटा के जेब की कमाई नहीं। बल्कि टाटा आपने वर्कर्स के वेतन से पांच हज़ार 6 महीने तक काटता रहेगा।

इस लेख को लिखे जाने के बाद दो बातें होंगी एक कल से मरीज़ों की परेशानी बढ़ जाएगी, उन्हें अस्पताल के बाहर सड़क किनारे नहीं सोने का फरमान आजाएगा लेकिन विकल्प नहीं बताया जाएगा कि वह कहां सोएंगे। ज़िला प्रशासन भी उस फरमान को अमल में लाने के लिए अस्पताल प्रबंधन का साथ देगा लेकिन वही ज़िला प्रशासन धतकिडीह मे लॉज नहीं खोलने देगा, भई लॉकडाउन जो है। दूसरा यह होगा कि लेख के ट्वीट के बाद भी ऊंची ऊंची नाक वाले टाटा के अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगेगी। क्योंकि ढिटाई में तो सरकारी अफसर भी इनके सामने पानी मांगने लगें। बहरहाल इसे पढ़ने के बाद भी आपमें कोई गुंजाईश बाकी है तो रात में किसी दिन बारिश हो रही हो तो कष्ट कर के कैंसर अस्पताल जाइए और देखिए जो मरीज़ दिन भर धक्के खाते हैं वह रात खड़ खड़े गुज़ार देते हैं, मैंने कल अम्फान तूफान से रात हो रही ज़बरदस्त बारिश में उन मरीज़ों का हाल देखा है। 


Khabar Khand

The Khabar Khand. Opinion of Democracy

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