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सुप्रीम कोर्ट आईटी एक्ट-66 A पर हैरान कि रद्द होने के बावजूद हो रहे केस दर्ज

Reported By : Ankit & Anusha Sharma

Published On : July 6, 2021

सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल पहले जो जो धारा रद्द कर दी थी सोमवार को अपने सामने आई एक जानकारी पर आश्चर्य जताया। एनजीओ पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने कहा कि आईटी एक्ट की धारा 66ए के तहत, जिसे 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने खत्म कर दिया था, 7 साल में एक हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं।केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने यह बताने की कोशिश की कि क्यों धारा 66 ए को खत्म किए जाने के बावजूद अभी भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
पीयूसीएल से मिली जानकारी के बाद जस्टिस आर नरीमन, जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने कहा कि यह हैरान करने वाली बात है. हम नोटिस जारी करेंगे। ये तो कमाल हो गया। जो कुछ हो रहा है वह भयानक है।

क्या है मामला

24 मार्च 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आईटी एक्ट की धारा 66ए को खत्म कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह कानून धुंधला, असंवैधानिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इस धारा के तहत पुलिस को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक या अपमानजनक सामग्री पोस्ट करने पर उपयोगकर्ता को गिरफ्तार करने का अधिकार था।
पीयूसीएल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने कहा कि 2015 में जब धारा 66ए को समाप्त किया गया था, तब इसके तहत 229 मामले लंबित थे। इस धारा को समाप्त किए जाने के बाद से अब तक 1307 नए मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें से 570 अभी भी लंबित हैं। जबकि 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि 66ए को खत्म करने के आदेश की एक कॉपी संबंधित हाई कोर्ट के जरिए हर जिला अदालत को भेजी जाए। इसकी एक प्रति राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भी भेजी जाए। इसके बाद इसकी सूचना हर थाने को भी भेजी जाए। इन आदेशों के बावजूद थाने में मामले दर्ज किए जा रहे हैं और कोर्ट में मुकदमा चल रहा है

क्यों उठा था ये मामला

2012 में कानून की छात्रा श्रेया सिंघल ने धारा 66ए के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहली जनहित याचिका दायर की थी। महाराष्ट्र में दो लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद जनहित याचिका दायर की गई थी, जिन्होंने अपने संस्थापक बाल ठाकरे के निधन के बाद शिवसेना द्वारा मुंबई में बुलाए गए बंद का विरोध किया था। एक को बंद के आह्वान के खिलाफ फेसबुक पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जबकि दूसरे को इसे “पसंद” करने के लिए गिरफ्तार किया गया था।

आईटी अधिनियम के अवलोकन पर, यह देखा जा सकता है कि इसमें धारा 66A है लेकिन फुटनोट में लिखा है कि धारा को समाप्त कर दिया गया है। इसलिए, अब जब एक पुलिस अधिकारी को मामला दर्ज करना होता है, तो वह धारा देखता है और फुटनोट को देखे बिना मामला दर्ज करता है,” वेणुगोपाल ने कहा। एक संभावित समाधान पर, उन्होंने कहा कि जो किया जा सकता है वह यह है कि धारा 66ए के बाद एक ब्रैकेट लगा दिया गया है, जिसमें उल्लेख किया गया है कि इसे खत्म कर दिया गया है और फ़ुटनोट में फैसले का पूरा उद्धरण रखा गया है।

एनजीओ ने कोर्ट से कहा

परेशान हो रहे हैं लोग, केंद्र से डेटा कलेक्ट करने को कहें
पीयूसीएल ने सुप्रीम कोर्ट से इस संबंध में केंद्र को निर्देश देने को कहा था। केंद्र को सभी पुलिस थानों से इस धारा के तहत मामले दर्ज नहीं करने के लिए कहना चाहिए। पीयूसीएल ने कहा, ‘देखें कि मामले कैसे आगे बढ़ रहे हैं। लोग परेशान हो रहे हैं। केंद्र को निर्देश दें कि वह इस कानून के तहत चल रही सभी जांच और मामलों का डेटा जुटाए. जो मामले कोर्ट में चल रहे हैं।” उनका डेटा भी एकत्र किया जाना चाहिए।


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