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ओपिनियन : केरल में जेण्डर बराबरी

Reported By : अंजलि सिन्हा

Published On : July 1, 2021



केरल – जिसने कोविड महामारी के नियंत्रण के मामले में तारीफ बटोरी, जिस राज्य की स्वास्थ्य मंत्री टीचर शैलजा को दुनिया भर में सराहा गया – वह राज्य स्त्री विरोधी हिंसा के मामले में सूर्खियों में है। कई महिलाओं की दुखद मृत्यु , जिनमें से कुछ में आत्महत्या का भी संदेह है, यह मामला चर्चा में आया है। 
घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न तथा जेण्डर आधारित अन्य अपराधों के बढ़ते मामलों के कारण मुख्यमंत्री  पिनाराई विजयन को पुलिस को आदेश देना पड़ा है कि वह 24 घंटे हेल्पलाईन पर मुस्तैद रहें। नेशनल क्राइम रेकार्डस ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 में दहेज हत्या के छह मामलों के साथ मिल कर पति तथा परिवार वालों द्वारा महिलाओं के खिलाफ हिंसा के 2,715 मामले दर्ज 2020 में दर्ज हुए हैं जो यौन हिंसा के बाद दूसरे नंबर का अपराध है। पुलिस रेकार्ड के मुताबिक वहां पिछले पांच सालों में दहेज हत्या के 50 मामले आए हैं। / देखें, इंडियन एक्स्प्रेस, संपादकीय, 28 जून 2021/

प्रश्न उठता है कि सामाजिक जीवन में अलग से आत्मविश्वासी जागरूक दिखने वाली मलयाली महिला आखिर घर में क्यों पीड़ित होती है ?

इधर बीच चर्चित मलयाली फिल्म ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ भी इसी हक़ीकत को अलग ढंग से उजागर करती है, जिसकी कहानी ‘‘इज्जतदार’’ मध्यमवर्गीय घरों के अंधेरे किचन की कहानी है। फिल्म के डायरेक्टर जीयो बेबी अपने साक्षात्कार में बताते हैं कि चूंकि मैं लैंगिक समानता में विश्वास करता हूं तो 2015 में अपनी शादी के बाद रसोईघर में समय देने लगा। कुछ समय बाद ही यह एहसास हो गया कि यहां बहुत झेलना पड़ता है। यहां की मुश्किलों, एकरसता और दोहराव से मैं छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा, ऐसा महसूस होता था कि मैं किसी जेल में फंस गया हूं।’
इस बात से सभी या अधिकतर लोग सहमत होंगे कि अभी हमारे देश और समाज को जेण्डर बराबरी की दिशा के लक्ष्य तक पहुंचने में बहुत फासला तय करना है। इस मामले में केरल का उदाहरण अक्सर आता रहता है कि वहां महिलाएं अधिक स्वतंत्र है और स्वनिर्भर भी हैं। ऐसी छवियां हम केरल के बारे में जानने और पढ़ने के अलावा आसपास देख समझ कर भी बनाते हैं जैसे कि हर अस्पताल में हमें केरल की नर्स मिलेगी, इनमें से कुछ अपने परिवार के साथ रहती हैं, लेकिन बड़ी संख्या ऐसी नर्सों की है जो दूर अपने राज्य से अकेले नौकरी के लिए आ गयी हैं, किराये के मकान में या वर्किंग वूमन हॉस्टल में रहती है। वे न सिर्फ देश के अन्य भागों में बल्कि अरब देशों में या पश्चिमी देशों में भी नर्स के रूप में या अन्य कामों के लिए चली जाती है। केरल के लिए एक शब्द ही चल पड़ा था कि ‘‘सूटकेस लाइफ’’ यानि वे एक सूटकेस के साथ अपनी नौकरी के लिए निकल पड़ती हैं। उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों के परिवारों में लड़कियों के लिए ऐसी छूट कहीं भी उपलब्ध नहीं है। 
इस तरह दूसरी बात जो सभी जानते हैं और जो हक़ीकत है कि शिक्षा में केरल अव्वल नंबर पर है और जाहिर है कि स्त्रा शिक्षा की दर /95 फीसदी/ भी पहले नंबर पर है। संतानों की संख्या को भी महिलाओं की स्थिति से जोड़ कर देखा जाता है क्योंकि अधिक बच्चा पैदा करना मतलब औरत की सेहत खराब होने के साथ श्रमबल में भागीदारी घटना भी होता है। उत्तर भारत की तुलना में केरल में परिवार में बच्चों की संख्या भी कम है।
कुल मिला कर कहें तो केरल एक पढ़ा लिखा, उदार विचार रखनेवाला सभ्य सुसंस्क्रत समाज का दर्जा पाने वाला राज्य है। यहां हिंसा , अत्याचार, असभ्यता, अंधविश्वास वैसे नहीं नज़र आता है जितना उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, राजस्थान आदि में दिखता है। 
वैसे केरल आगे है इसमें कोई संदेह नहीं है, बस समझना यह है कि आखिर इसके बावजूद वहां जेण्डर गैरबराबरी होने की वजहें क्या होंगी ?

क्या यह कहना वाजिब है कि पितृसत्ता की जड़ें इतनी गहरी हैं ?

जेण्डर बराबरी के लिए हम उम्मीद किससे करते हैं ? 
एक तो सरकार से कि वह ऐसी नीतियां बनाएं जिससे बराबरी के अवसर पैदा हों, स्त्रीद्रोही हिंसा के लिए ऐसे कानून बनाए और लागू ऐसे करे कि स्त्री  के खिलाफ हिंसा पर लगाम लगे। दूसरे समाज सुधार आंदोलन चले, जागरूकता का वातावरण बने तथा जनता में चेतना स्तर को बढ़ाया जाए, यह दोनों ही बातें केरल में उपस्थित रही हैं। 
हम जानते ही हैं कि प्रगतिशील, उदार सोच वाली सरकारें आजादी के बाद लगातार रही हैं, जिन्होंने हमेशा बराबरी के लिए पक्षधरता जतायी है। अभी इसी उदाहरण से हम देख सकते हैं कि जैसे जैसे केरल के समाज में जेण्डर मुददों के इर्दगिर्द बहस तेज हुई है केरल सरकार की तरफ से यह कहा गया है कि वह स्कूली पाठयक्रमों को संशोधित करेगी ‘‘ताकि जेण्डर समानता की संस्क्रति का संवर्द्धन’’ किया जा सके और ‘‘ऐसे शब्दों और मुहावरों को छाना जा सके जो स्त्रियों के प्रति अपमानजनक समझे जाते हैं’’। इतनाही नहीं ऐसे कदमों पर जोर देने की बात चली है कि ‘‘ ताकि राज्य के स्कूलों को एवं कालेजों में ऐसा वातावरण बने ताकि वहां जेण्डर समानता और समान अधिकारों की बातें आसानी से ग्रहण हो सकें।

सामाजिक स्तर पर प्रयासों, आंदोलनों की बात है तो केरल में समाजसुधार आंदोलन की लंबी परंपरा रही है। अय्यनकली की अगुआई में उठ खड़ा हुआ दलितों-शोषितों के सम्मान का आंदोलन हो, जहां ऐसे बच्चों के शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए 1904 में खेत मजदूरों की हड़ताल के उदाहरण मिलते हैं ; जहां नारायण गुरू की पहल पर इज़ावा तथा अन्य पिछड़े समुदायों में उठी बदलाव की लहर का मामला हो या आज़ादी के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण को लेकर चली जनजाग्रति मुहिमों और आंदोलनो ंका सिलसिला हो, शेष भारत की तुलना में केरल का सामाजिक-सांस्कृतिक -राजनीतिक इतिहास एक अलग छवि पेश करता है।

सभी तबकों को साथ लेकर चले केरल के विकास के ‘केरल मॉडल’ की चर्चा तीसरी दुनिया के देशों में होती रहती है। सांप्रदायिक दंगों या तनावों का जितना लंबा सिलसिला हम उत्तर भारत के राज्यों में देखते हैं, वैसी स्थितियां केरल में कभी मौजूद नहीं रही हैं।
तब फिर यही सवाल उठता है कि फिर पितृसत्ता को जितनी जबरदस्त चुनौती यहां मिलनी चाहिए थी वह क्यों नहीं मिल सकी है। क्या सामाजिक सुधार आंदोलनों में भी स्त्री  मुक्ति का प्रश्न, जेण्डर समानता का मसला उतनी जगह नहीं पा सका है, जिसका असर हमें दिख रहा है ? क्या चूंकि जेण्डर समानता का एक पहलू परिवार के निजी दायरे से जुड़ा होता है, और परिवार नामक संस्था में बहुत कम समय में अभी ऐसे तेज बदलावों की उम्मीद नहीं की जा सकती।   
क्या यह माना ही जाए कि पितृसत्ता का चरित्र ही ऐसा है कि वह अधिक जडमूल होती है और मौका पाते ही अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश करती है, जिसके लिए अधिक लंबे सामाजिक उथल पुथल से हमें गुजरना होगा।


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