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झारखंड : ब्लैक फंगस के मरीज़ को 20 लाख के इलाज के नाम पर राज्य से मिला 50 हज़ार का आश्वासन, हाईकोर्ट में सुनवाई के बाद हुआ इलाज

Reported By : Raj Laxmi

Published On : July 11, 2021

स्वास्थ्य व्यवस्था किसी भी राष्ट्रीय के विकासशील ढांचे की सबसे बुनियादी सुविधाओं में से एक मानी जाती है। परंतु यदि एक दिन इसी व्यवस्था की खटिया खड़ी हो जाए तो फिर राष्ट्रीय की अवधारणा ही शून्य में चली जाती है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यह अवधारणा लोकतंत्र के प्रत्येक उस राष्ट्रीय पर निर्भर करती है जिसके संचालक ने वहाँ की जनता के सामने उनकी रक्षा और सेवा करने की कसमें खाई थी।

शून्य की ओर इशारा करती स्वास्थ्य व्यवस्था

शून्य की ओर इशारा करती यही स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति अब झारखंड में भी नज़र आ रही है। यहाँ की राज्य सरकार अब नागरिकों के समकक्ष स्वास्थ्य व्यवस्था के नाम पर अपने हाथ खड़े कर चुकी है। जनता के लिए कल्याणकारी मानी जाने वाली राज्य सरकार अब जनता की पीड़ा में पैसों की कमी का रोना रो रही है। यहाँ हालात इतने बिगड़ चुके है कि अब अपने राज्य में सही स्वास्थ्य सुविधा पाने के लिए जनता को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।

जानिए क्या है पूरा मामला

कोविड काल ने न सिर्फ पूरे देश के स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल-खोल दी बल्कि इस पोल-खोल में राज्यों का भी बड़ा हाथ है। क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव नीचे से ही हिली नज़र आई। अभी कोविड पूरी तरह गया भी नहीं है कि ब्लैक फंगस ने अलग तबाही का मंजर खड़ा कर दिया। हालात यह हुए की राज्यों ने इसे महामारी की श्रेणी तक दे दी। परंतु इस दौरान राज्यों में केवल इस नई महामारी से लड़ने की प्लानिंग की। इस पूरी तैयारी के दौरान इलाज का प्रयास शून्य ही नज़र आया।

झारखंड के स्वास्थ्य सिस्टम की पोल-खोल करती यह कहानी केवल लोगों के बीच डर का मंजर खड़ा करती है। गिरीडीह टाउन की रहने वाली ऊषा देवी 17 मई से ही ब्लैक फंगस के संक्रमण के कारण रांची स्थित रिम्स में भर्ती हैं। हालात बिगड़ने पर जून के अंतिम सप्ताह में रिम्स के डॉक्टरों ने ऊषा देवी के बेटे से मां को तमिलनाडु ले जाने की बात कही। परन्तु इलाज के कर्जे से दबे परिवार के पास एक और खर्चा वहन करने की हिम्मत नहीं रही। पुत्र गौरव कुमार गुप्ता को उम्मीद थी कि उनकी सरकार कुछ इंतेज़ाम करेगी। लेकिन मुख्यमन्त्री के पी.ए. ने गौरव से साफ शब्दों में कह दिया कि झारखंड सरकार के पास इतने पैसे नहीं हैं कि उनकी मां को एयरलिफ्ट कर तमिलनाडु भेजा जाए।

इतने पर भी हार नहीं मानते हुए इस इंकार के बाद गौरव ने 3 जुलाई को ही मुख्यमन्त्री को एक पत्र लिखा कि यदि मां को एयर एंबुलेंस की सुविधा नहीं मिली और इस दौरान मां की जान इलाज के अभाव में चली गई तो ज़िम्मेदार झारखंड सरकार होगी। और हम बच्चे रिम्स अस्पताल में फांसी लगा लेंगे। परंतु अब इसे राज्य सरकार की बेरुखी समझिए या झारखंड के गरीबी का रोना रोते मुख्यमंत्री की दुर्दशा कि इतना कहने पर भी न तो इलाज की कोई व्यवस्था की गई और न ही एयर एंबुलेंस की कोई पहल।

गौरव यह कहते नज़र आता है कि “ब्लैक फंगस का संक्रमण ब्रेन तक पहुंच गया है इस लिए डॉक्टर ने माँ को तमिलनाडु के प्राइवेट अस्पताल में इलाज की बात कही। मैंने खर्च पूछा तो डॉक्टर द्वारा लगभग बीस लाख रुपये बताया गया। अब हम इतना बड़ा खर्च कहां से पूरा करते। हम पहले ही कर्ज़दार हो चुके थे। डॉक्टर साहब बाहर से दवा मंगवाते थे। जो कभी कभी रांची में भी नहीं मिलती थीं। तब टाटा या धनबाद जाकर दवा लानी पड़ी। इस तरह डेढ़ लाख रुपए की दवा हम कर्ज़ लेकर बाहर से खरीद चुके थे।”

“मदद की उम्मीद के तौर पर जब मुख्यमंत्री से बात करनी चाही तो मुख्यमन्त्री जी के पी.ए. सर कहते है आपकी मांग नहीं पूरी हो सकती। ज़्यादा से ज़्यादा पचास हज़ार से एक लाख की मदद हो सकती है। मैंने उनसे रिक्वेस्ट की कि पैसा नहीं चाहिए, आप सिर्फ इलाज करा दीजिए। लेकिन वह बोले कि जो पैसे सरकार देगी उससे इलाज नहीं होगा तो तुम्हारे खाने का खर्च पूरा हो जाएगा।” गौरव ने आगे कहा कि “जब मुख्यमन्त्री जी के कार्यालय से मदद नहीं मिली तब हम एक दिन अस्पताल के इमरजेंसी गेट के पास धरना भी दिये और मांग की कि ‘बेहतर इलाज दो या इच्छा मृत्यु दो’ लेकिन रिम्स के किसी डॉक्टर ने हमारी खबर नहीं ली।”

क्या सही इलाज के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना ही एक मात्र उम्मीद?

ऊषा देवी के इस मामले की जानकारी सामाजिक कार्यकर्ता अंकित राजगड़िया को हूई। अंकित ने रांची हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखा। जिसे पढ़ कर मुख्य न्यायधीश ने स्वयं संज्ञान लेते हुए 7 जुलाई को मामले की सुनवाई तय कर दी। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि न सिर्फ चीफ जस्टिस ने मामलें की सुनवाई की बल्कि उनकी फटकार के साथ ही तमिलनाडु में होने वाला ऑपरेशन रांची के रिम्स अस्पताल में ही सम्भव हो गया। सुनवाई के दौरान रिम्स प्रबंधन ने दवा की सप्लाई नहीं होने की बात स्वीकारी। परन्तु अब भी सवाल वही रह जाता है कि क्या अब नागरिकों को सरकारी अस्पताल में सही इलाज के लिए हर बार हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की जरूरत है?

क्लिनिकल वर्कफोर्स की कमी से झुझता झारखंड

अब इतने देर से हम झारखंड के जिस स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली की बात कर रहे थे उसका एक दृश्य यह देखकर ही समझ आ जाता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानक के अनुसार डॉक्टर एवं आबादी का अनुसार 1:1000 होना चाहिए। लेकिन झारखंड की स्थिति बिल्कुल भिन्न है. इस समय राज्य की 3.25 करोड़ आबादी पर लगभग 10,000 डॉक्टर हैं। अत: डॉक्टरों की अनुमानित कमी 22,500 से अधिक है। जबकि झारखंड में मौजूद तीन मेडिकल कॉलेज से प्रति वर्ष 300 डॉक्टर ही उत्तीर्ण होते हैं। तो झारखंड के लचर स्वास्थ्य सिस्टम का सबसे बड़ा कारण राज्य में क्लिनिकल वर्कफोर्स की कमी है।

जब ढांचा मजबूत ही नहीं रहेगा तो इमारत का गिरना तो तय है!

तो अब यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि राज्य सरकार विकास के मानक के तौर पर क्या केवल इमारतों और सड़कों को ही तरहीज देते है? क्या वाकई राज्य के लोगों की बुनियादी सुविधाओं में स्वास्थ्य की कोई प्राथमिकता नहीं है? और यदि वाकई राज्य सरकार के लिए स्वास्थ्य एक प्राथमिक विषय है तो फिर इसपर पहल क्यों नहीं कि जा सकती? कहावत है कि दिखता है वही बिकता है, तो क्या वाकई राज्य सरकार दिखावे की इसी ललक में केवल जनता के वोट चाहती है। अमूमन ही झारखंड के कुछ लाख लोगों के अलावा कोई भी झारखंड के स्वास्थ्य सिस्टम में वर्कफोर्स के वृद्धि की रिपोर्ट पढ़ेगा या समझने का प्रयास करेगा। तो फिर अगले चुनाव में सरकार वोट किस आधार पर मांगेगी! बात फिर वहीं आकर अटकेगी कि जब ढांचा मजबूत ही नहीं रहेगा तो इमारत का गिरना तो तय है!


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