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समेकित बाल विकास योजना का नहीं मिल पा रहा ग्रामीणों को पूरा लाभ, कुछ ने कहा केंद्र दूर तो कुछ को नहीं पता योजना

Reported By : Raj Laxmi

Published On : July 7, 2021

समेकित बाल विकास योजना के तहत दी जाने वाली पोषाहार सम्बन्धी सेवाओं के संबंध में भोजन का अधिकार अभियान ,झारखण्ड और विभिन्न नगर समाज संगठनों के संयुक्त प्रयास द्वारा एक सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण से प्राप्त हुए आंकड़े अधिक संतोषजनक नहीं रहे। सर्वेक्षण राज्य के कुल 24 जिलों के 159 प्रखंडों में किया गया। इसके तहत कुल 8,818 परिवारों से राज्य के द्वारा समेकित बाल विकास योजना के तहत पोषाहार संबंधित सेवाओं से संबंधित सवाल किए गए।

कुछ ने कहा केंद्र दूर तो कुछ ने कहा पता ही नहीं योजना

इस सर्वेक्षण में कुल अनुसूचित जन जाति : 3812 ,अनुसूचित जाति : 1914 तथा विशेष रूप से वंचित जन जाति : 421 एवं अन्य : 2671 लोगों को शामिल किया गया। इसके तहत पता चलता है कि ,3.32 प्रतिशत योग्य परिवार किसी भी आंगनबाड़ी केंद्र से नहीं जुड़ सका हैं। इनमे सबसे ज्यादा निबंधित नहीं होने र्वाले 6 % परिवार विशेष रूप से वंचित परिवार से आते है। इनमे से 94 % परिवारों ने निबंधित होने की इच्छा तो जताई है जिनमें से 46 % परिवारों का कहना है कि केंद्र की दूरी की वजह से वह अपना निबंधन नहीं करवा पाए है जबकि 48% परिवारों का कहना है कि निबंधन के लिए उनसे अबतक किसी भी सरकारी व्यक्ति ने संपर्क भी नहीं किया है।

पोषाहार के नाम पर 89% लोगों को पकड़ाया चावल

इस तरह के सबसे अधिक मामलें पलामू,गढ़वा ,लातेहार रांची ,गिरिडीह और गोड्डा से सामने आए। वहीं, आकड़ो से पता चलता है कि जनवरी में सबसे अधिक 58 % परिवारों को ये पोषाहार प्राप्त हुआ और सबसे कम 17 % को मई माह में ये पोषाहार प्राप्त हो सका है। वहीं, आंकड़े बताते है कि पोषाहार के नाम पर 89% लोगों को चावल पकड़ाया गया है। जबकि मात्र 16% लोगों को घी मिल सका है। सर्वेक्षण की सूची में जहाँ 73 % परिवारों में 6 माह से तीन साल के बच्चें ,और गर्भवती महिलाएं शामिल थी उनमे से मात्र 32 % परिवारों को ही घर ले जाने वाला राशन दिया गया है।

सर्वेक्षण में पाए गए 3% बच्चें कुपोषित, नहीं मिल रहा सरकार से कोई अधिक राशन

जितने भी परिवारों का सर्वेक्षण किया गया उनमें से 3% परिवार ऐसे थे जहां बच्चें कुपोषण के शिकार मिले। जिनमें से सबसे अधिक कुपोषित बच्चें पलामू,पाकुड और दुमका जिले से पाए गए। इन अति कुपोषित बच्चों में मात्र 31 % बच्चों को ही अतिरिक्त राशन मिल सका है। वहीं, सिर्फ 13 % परिवारों ने पैकेट में मिलने वाले उपमा या पंजीरी को ठीक बताया जबकि ,60 प्रतिशत परिवारों ने SHG द्वारा दिए जाने वाले सूखे राशन को उपयुक्त बताया।

सरकार ध्यान दे कहाँ खामी रह गई!

वहीं, आंकड़े बताते है कि 26% परिवार ऐसे है जिनको कई माह से किसी भी तरह का कोई भी राशन नहीं मिल सका है। अंततः तमाम आंकड़े स्वयं से ही ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजना के प्रति असन्तुष्टता प्रकट कर रहें है। अब भले ही इसपर राज्य सरकार कई तरह के पर्दे डालकर योजना का स्वरूप बदल डाले परंतु सीधे तौर पर ग्रामीण कभी पूरे प्रतिशत में इन योजनाओं से जुड़ ही नहीं पाए। अब यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि आखिर गलती कहाँ है योजना के क्रियान्वयन में या फिर जनता से जुड़ पाने में!


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