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कोरोना पर मोदी के भावुक भाषण और “जनता कर्फ्यू के बीच “रणनीति” नदारद

Reported By : Mohammad Sartaj Alam

Published On : March 23, 2020


बहरहाल जनता कर्फ्यू की रात गुज़र चुकी है और देश भर के कई राज्यों ने अपने-अपने कई ज़िलों में “लॉक डाउन” घोषित कर दिया। खबर-खंड में छपी पिछली रिपोर्ट में हमने यह बताय था कि देश बाहर के अस्पतालों में 84000 लोगों पर एक आइसोलेशन बेड है तो वहीं क्वारंटाइन बेड 36000 लोगों पर एक है। स्थिति का अंदाज़ा लगाइये कि भगवान् न करे यदि स्थिति ज़रा भी चिंताजनक हुई तो इस इंफ़्रा-स्ट्रक्चर से क्या होगा? खबर तो यह भी है कोरोना टेस्ट किट भी ज़रूरत भर नहीं हैं, रही बात सेंटर की तो उसकी संख्या भी चिंताजनक नहीं है। 

19 मार्च को प्रधानमंत्री ने दिया सन्देश 

इतिहास लिखा जा चूका है कि कोविड-19 के प्रकोप से जब सम्पूर्ण विश्व महामारी से जूझ रहा है 19 मार्च को उसी समय प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में भारतीयों को लॉकडाउन की करने की सलाह दी। उनहोंने रविवार को अपनी-अपनी बालकनियों पर खड़े होकर डॉक्टरों, नर्सों और जारी जन स्वास्थ्य संकट से लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मियों का शुक्रिया अदा करने को भी कहा था। 

राष्ट्र के नाम दिए गए सन्देश से ज़रूरी बात गायब थी 

राष्ट्र के नाम सन्देश में महामारी की तुलना विश्व युद्ध से करने वाले  मोदी ने दुनिया भर में कोविड के विस्फोट के बारे में बात तो की लेकिन उनके भाषण से जो ज़रूरी बातें गायब थीं। उन बातों में अहम् बात “सरकार कोरोना के इस संकट को कम करने की कैसी रणनीति बना रही है” पूरी तरह से गायब थी।

सरकार ने ज़मीन पर काम कर रहे मेडिकल स्टाफ जो मास्क, गाउन और अन्य प्रकार के सुरक्षा उपकरणों की समस्या झेल रहे हैं उनके  लिए किसी तरह के आर्थिक पैकेज की पेशकश नहीं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी का भाषण भावनात्मक था? वह लोगों से सहयोग मांग रहे थे, जबकि उन्हें इस संकट को कम करने हेतु सरकार की रणनीति के बारे में खुलासा करना चाहिए था। 

कोरोना यदि विश्वयुद्ध सरीखा है तो फिर तैयारी युद्ध स्तर की क्यों नहीं? 

देश के नागरिकों को तीन श्रेणी में बांटिए- एक स्वास्थ्य कर्मी, दूसरे नंबर पर सफाईकर्मी और तीसरे नंबर पर आम नागरिक। मुझे नहीं लगता कि मोदी जी का भाषण तीनों श्रेणी के नागरिकों की चिंताओं को दूर करने वाला था। उन्होंने अपने भाषण से बस इतना किया कि महामारी तुलनात्मक दृष्टि से विश्व युद्ध जैसी है तो लोगों को चैहा कि बालकनियों में खड़े होकर ताली बजाने, थाली बजने के साथ संयम रखें। अब यदि कोरोना का खतरा युद्ध सरीखा है तो उन्होंने यह नहीं बताया कि युद्ध जैसी हालत में उनकी सरकार की तैयारी कैसी है। 

चलिए मान लिया जाये कि कोरोना से जंग विश्वयुद्ध सरीखी है, तो फिर इस जंग को लड़ने वाले सैनिकों को अब तक क्या सुविधाएं दी गईं? युद्ध सरीखी इस जंग में दोनों प्रकार के सैनिक यानी स्वास्थ कर्मी एवं सफाई कर्मी को कौन कौन से सेफ्टी इक्विपमेंट दिए गए? या फिर इन दोनों के लिए सरकार ने कौन सा बजट बना कर रखा है। 

कोविड-19 की जांच करने वाले देशों भारत बहुत पीछे

मोदी ने उस विवाद की चर्चा नहीं की जिसमें भारत को दुनिया के सबसे कम कोविड-19 की जांच करने वाले देशों में गिना जा रहा है।उन्होंने जांच किटों की संख्या से संबंधित चिंताओं पर बात नहीं की और यह भी नहीं बताया कि जनता को कितनी कीमत पर कोविड-19 का इलाज उपलब्ध होगा। जबकि विशेषज्ञ आने वाले दिनों में मामलों की सुनामी की चेतावनी दे रहे हैं।

मोदी का संबोधन ने बस इतना साफ कर दिया कि भारत सरकार संकट कम करने की रणनीति को गुप्त रखने वाली है और वह मेडिकल सेवा देने वाले समुदायों की ज़रूरतों को प्राथमिकता नहीं देने जा रही है।

डॉ. शलीका मालवीय ने क्यों ट्वीट कर लिखा, “कृपा रविवार 5 बजे घर से निकल कर हमारा हौसला न बढ़ाएं…”

संकट से लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मी ने मोदी के भाषण से मिली निराशा को ट्वीटर व्यक्त कर दिया। तामिलनाडु की डॉ. शलीका मालवीय ने ट्वीट कर लिखा, “कृपा रविवार 5 बजे घर से निकल कर हमारा हौसला न बढ़ाएं बल्कि आप जहां हैं वहीं से प्रधानमंत्री से अनुरोध करें कि वह आपको कोविड-19 की जांच करवाने दें। उनसे अस्पतालों में बिस्तरों, वैंटीलेटरों और मास्क को बढ़ाने, स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए पीपीई और सबसे हाशिए के लोगों के लिए आर्थिक सहयोग की मांग करें।” 

कोविड रोगियों का उपचार कर रहे एक डॉक्टर की पत्नी डॉक्टर आफरीन उस्मान ने ट्वीट पर लिखा, “एक डॉक्टर और कोविड मरीजों का उपचार करने वाले डॉक्टर की पत्नी होने के नाते मैं आप से कहना चाहती हूं कि हम नहीं चाहते कि आप हमारे लिए ताली बजाएं। वास्तम में हमें और अधिक टेस्टिंग किटों, बेहतर क्वारंटीन सुविधाओं, पोशाकों और ज्यादा जागरुकता यानी सही तरह की जागरुकता की ज़रूरत है।”

मोदी ने हमेशा की तरह नागरिकों को अपने कर्तव्यों का पालन करने की सलाह ज़रूर दे डाली, लेकिन यह नहीं बताया कि राष्ट्र की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए उनकी सरकार क्या कर रही है? संबोधन में वह यह भी बताने में विफल रहे कि कोविड से भारत को किस तरह का खतरा है? उन्होंने यह भी नहीं बताया कि देश इस संकट से किस तरह लड़ रहा है? उन्होंने यह भी नहीं बताया कि गिरती जारही इकॉनमी पर कोरोना का क्या असर पड़ेगा? यह एक चिंता की बात है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद अब तक सामुदायिक संक्रमण के खतरे को कम करके आंक रहे हैं?

स्थानीय संक्रमण वाला देश है भारत: WHO

भारत अपनी बात पर अड़ा हुआ है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को स्थानीय संक्रमण वाला देश बताया है। कहने का मतलब यह है कि WHO के इस बयां के साथ ही अब भारत इटली, कोरिया और चीन सरीखे देशों की फेहरिस्त में शामिल हो गया है। कारवां के अनुसार एक जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ का कहना है, “यदि सामुदायिक संक्रमण न होने की बात सही है तो फिर सरकार ने महामारी रोग कानून, 1897 को लागू ही क्यों किया है? हम लॉकडाउन का अभ्यास भला क्यों कर रहे हैं? सरकार दोनों ही तरह की भाषा बोल रही है लेकिन राष्ट्रीय जन स्वास्थ्य के हितों के संबंध में कोई निर्णय नहीं ले रही है?”

मोदी की अपील केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से एकदम उल्टी दिशा में क्यों प्रतीत होती है?

मोदी ने लोगों से अपील की कि वे सरकार के दिशानिर्देशों का पालन करें। उन्होंने कहा, “आज 130 करोड़ देशवासियों को अपना संकल्प और दृढ़ करना होगा कि हम इस वैश्विक महामारी को रोकने के लिए एक नागरिक के नाते अपने कर्तव्य का पालन करेंगे. केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के दिशानिर्देशों का पूरी तरह से पालन करेंगे।” बस यहीं से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से एकदम उलटा प्रतीत होता है। 

याद कीजिए जिस दिन मोदी भारतवासियों को बर्तन बजाने का नुस्खा बता रहे थे, उसी दिन विजयन ने केरल में इस संकट से निपटने के लिए 20000 करोड़ रुपए के वित्तीय पैकेज का ऐलान किया। जिसमें  500 करोड़ रुपए समर्पित स्वास्थ्य सेवाओं के लिए, 2000 करोड़ रुपए कर्ज और मुफ्त राशन के लिए, 1000 करोड़ रुपए मनरेगा के लिए और 1320 करोड़ रुपए सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लिए आवंटित किए। यही नहीं केरल सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे के प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए 1000 रुपए आवंटित किए हैं जिन्हें सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल रही है। इसके लिए राज्य सरकार ने 100 करोड़ रुपए उपलब्ध कराए हैं। साथ ही इस पैकेज के अंतर्गत राज्य सरकार ने घोषणा की कि वह कम कीमत वाले 1000 आहारगृह लगाएगी जहां 20 रुपए में खाना उपलब्ध होगा। सरकार ने यह भी कहा है कि उपभोक्ताओं को अपने बिजली और पानी के बिलों का भुगतान करने के लिए एक महीने का वक्त दिया जाएगा और सिनेमा हॉलों को मनोरंजन कर में छूट दी जाएगी।

यह बहुत साफ है कि केरल ने कोरोना के संकट से निपटने की बेहतर तैयारियां की हैं। तो दूसरी तरफ यह भी बिल्कुल साफ है कि प्रधानमंत्री मोदी जन स्वास्थ्य संकट का सामना करने की रणनीति तैयार करने में फेल हो गए हैं। 


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